Thursday, January 28, 2021
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The Presidential Years 2012-2017: Pranab Mukherjee’s autobiography released|वर्ष 2014 में इसलिए हारी थी कांग्रेस, प्रणब मुखर्जी ने आत्मकथा में बताई वजह

नई दिल्ली: देश के पूर्व राष्ट्रपति रहे प्रणब मुखर्जी  (Pranab Mukherjee) की आत्मकथा ‘द प्रेसिडेंसियल ईयर्स 2012-2017’ (The Presidential Years 2012-2017) मंगलवार को बाजार में आ गई. इस किताब में प्रणब मुखर्जी ने लिखा कि कांग्रेस (Congress) का अपने करिश्माई नेतृत्व के खत्म होने की पहचान नहीं कर पाना 2014 के लोकसभा में उसकी हार के कारणों में से एक रहा होगा. प्रणब मुखर्जी ने यह किताब पिछले साल अपने निधन से पहले लिखी थी.

‘पीएम मोदी ने नोटबंदी ने पहले मुझसे चर्चा नहीं की’

मुखर्जी (Pranab Mukherjee) ने अपनी किताब में लिखा कि नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) सरकार अपने पहले कार्यकाल में संसद को सुचारू रूप से चलाने में विफल रही. इसकी वजह उसका अहंकार और अकुशलता है. उन्होंने पुस्तक में लिखा,’प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ नवंबर 2016 को नोटबंदी की घोषणा करने से पहले उनके साथ इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं की थी, लेकिन इससे उन्हें हैरानी नहीं हुई क्योंकि ऐसी घोषणा के लिए आकस्मिकता जरूरी है.’

‘वर्ष 2014 के चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन से हुई निराशा’

पूर्व राष्ट्रपति ने किताब (The Presidential Years 2012-2017) में लिखा, ‘2014 के लोकसभा चुनाव की मतगणना वाले दिन मैंने अपने सहायक को निर्देश दिया था कि मुझे हर आधे घंटे पर रुझानों के बारे में सूचित किया जाए. नतीजों से इस बात की राहत मिली कि निर्णायक जनादेश आया, लेकिन किसी समय मेरी अपनी पार्टी रही कांग्रेस (Congress) के प्रदर्शन से निराशा हुई.’ 

‘कांग्रेस के 44 सीट हासिल करने से हुई हैरानी’

उन्होंने पुस्तक में लिखा है, ‘यह यकीन कर पाना मुश्किल था कि कांग्रेस सिर्फ 44 सीट जीत सकी. कांग्रेस (Congress) एक राष्ट्रीय संस्था है जो लोगों की जिंदगियों से जुड़ी है. इसका भविष्य हर विचारवान व्यक्ति के लिए हमेशा सोचने का विषय होता है.’ कांग्रेस की कई सरकारों में केंद्रीय मंत्री रहे मुखर्जी ने 2014 की हार के लिए कई कारणों का उल्लेख किया है.

‘पार्टी करिश्माई नेतृत्व की पहचान करने में विफल रही’

प्रणब मुखर्जी (Pranab Mukherjee) ने किताब (The Presidential Years 2012-2017) में लिखा, ‘मुझे लगता है कि पार्टी अपने करिश्माई नेतृत्व के खत्म होने की पहचान करने में विफल रही. पंडित नेहरू जैसे कद्दावर नेताओं ने यह सुनिश्चित किया कि भारत अपने अस्तित्व को कायम रखे और एक मजबूत व स्थिर राष्ट्र के तौर पर विकसित हो. दुखद है कि अब ऐसे अद्भुत नेता नहीं हैं, जिससे यह व्यवस्था औसत लोगों की सरकार बन गयी.’

‘संसद चलाने में NDA सरकार ने दिखाया घमंड’

इस पुस्तक (The Presidential Years 2012-2017) में उन्होंने राष्ट्रपति के पद पर रहते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने सौहार्दपूर्ण संबंधों का भी उल्लेख किया है. हालांकि, मुखर्जी ने इस पुस्तक में नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान संसद को सुचारू से चलाने में विफलता को लेकर राजग सरकार की आलोचना की है. उन्होंने लिखा, ‘मैं सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच कटुतापूर्ण बहस के लिए सरकार के अहंकार और स्थिति को संभालने में उसकी अकुशलता को जिम्मेदार मानता हूं.’ 

ये भी पढ़ें- पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब ‘द प्रेजिडेंशियल इयर्स’ को लेकर पुत्र और पुत्री के बीच विवाद

‘पीएम को संसद में मौजूद रहना चाहिए’

मुखर्जी (Pranab Mukherjee) के मुताबिक, सिर्फ प्रधानमंत्री के संसद में उपस्थित रहने भर से इस संस्था के कामकाज में बहुत बड़ा फर्क पड़ता है. चाहे जवाहलाल नेहरू हों, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी अथवा मनमोहन सिंह हों, इन्होंने सदन में अपनी उपस्थिति का अहसास कराया. प्रधानमंत्री मोदी (Narendra Modi) को अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों से प्रेरणा लेनी चाहिए और नजर आने वाला नेतृत्व देना चाहिए.’

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